राजनांदगांव का ग्राम घुपसाल बना मिसाल- कम पानी वाली फसलों से बढ़ा भू-जल स्तर, संकट से मिली मुक्ति
रायपुर : छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के छुरिया विकासखंड स्थित ग्राम घुपसाल ने जल संरक्षण और टिकाऊ खेती (सस्टेनेबल फार्मिंग) की दिशा में पूरे प्रदेश के सामने एक प्रेरणादायी उदाहरण प्रस्तुत किया है। पारंपरिक और अधिक पानी की खपत वाली धान की फसल के चक्रव्यूह से बाहर निकलते हुए यहाँ के किसानों ने रबी सीजन में एक सामूहिक व ऐतिहासिक निर्णय लिया। किसानों ने धान के स्थान पर कम पानी में तैयार होने वाली मक्का, दलहन और तिलहन की फसलों को अपनाया, जिसके अत्यंत सकारात्मक परिणाम अब धरातल पर दिखाई देने लगे हैं। इस अभिनव पहल से न केवल ग्राम का भू-जल स्तर सुधरा है, बल्कि पेयजल और निस्तारी की पुरानी समस्या का भी स्थायी समाधान हो गया है।
कलेक्टर जितेंद्र यादव ने खेतों में पहुंचकर जाना किसानों का अनुभव’
ग्राम घुपसाल के इस सफल नवाचार की गूंज प्रशासनिक हलकों तक भी पहुँची। जिला कलेक्टर जितेन्द्र यादव ने स्वयं ग्राम घुपसाल का दौरा कर किसानों के इस अनूठे प्रयास का बारीकी से अवलोकन किया। उन्होंने खेतों में जाकर फसलों की स्थिति देखी और ग्रामीणों से सीधे संवाद कर खेती की नई पद्धतियों तथा उनके अनुभवों की जानकारी ली।
वर्तमान समय में पर्यावरण और जल संकट को देखते हुए कम पानी में अधिक और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन देने वाली फसलों को अपनाना समय की मांग है। इससे न केवल खेती की लागत (इनपुट कॉस्ट) कम होती है, बल्कि वैकल्पिक फसलों के बेहतर बाजार मूल्य से किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होती है। ग्राम घुपसाल का यह क्रॉप डायवर्सिफिकेशन (फसल विविधीकरण) मॉडल पूरे छत्तीसगढ़ के लिए एक अनुकरणीय मिसाल है।
350 एकड़ का सामूहिक संकल्प-तालाबों में फागुन के बाद भी बना रहा पानी
ग्रामीणों ने अपने पुराने कड़वे अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि पूर्व में गर्मी का मौसम आते ही गांव में हाहाकार मच जाता था। मार्च का महीना बीतते-बीतते गांव के तालाब, हैंडपंप और बरसाती नाले पूरी तरह सूख जाते थे, जिससे पेयजल और मवेशियों के निस्तारी की गंभीर समस्या उत्पन्न हो जाती थी। इस वर्ष गांव के किसानों ने एकजुट होकर 350 एकड़ से अधिक रकबे में धान की खेती पूरी तरह बंद कर दी और उसकी जगह कम पानी वाली फसलें लीं। इसका सीधा असर यह हुआ कि जमीन के भीतर का पानी सुरक्षित रहा और भू-जल स्तर ऊपर आ गया। ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक बताया कि जिन तालाबों में फागुन (मार्च) के बाद धूल उड़ती थी, वहाँ इस वर्ष अप्रैल के अंत में भी पर्याप्त पानी भरा हुआ है।
ग्राम घुपसाल की यह सफलता कहानी साबित करती है कि अगर नीतिगत समझ और जनभागीदारी का सही समन्वय हो, तो प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण बिना सरकारी दबाव के भी किया जा सकता है। यह गांव आज श्बदलते छत्तीसगढ़श् की जागरूक किसानी का एक जीवंत चेहरा बनकर उभरा है।

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